भगवद्गीता में कर्मयोग की दार्शनिक मीमांसा
Keywords:
कर्मयोग, निष्काम कर्म, स्वधर्म, गुणत्रय, समत्व, स्थितप्रज्ञ, यज्ञ, भगवद्गीता, अनासक्तिAbstract
श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय दर्शन का वह अद्वितीय ग्रंथ है जिसमें जीवन के व्यावहारिक और आध्यात्मिक द्वंद्वों का समाधान प्रस्तुत किया गया है। कर्मयोग, गीता के केंद्रीय सिद्धांतों में से एक है, जो कर्म को त्यागने के बजाय फलासक्ति के त्याग पर बल देता है। यह विस्तारित अध्ययन गीता में वर्णित कर्मयोग की दार्शनिक संरचना — निष्काम कर्म, स्वधर्म, गुणत्रय-विवेचन, समत्व-बुद्धि, स्थितप्रज्ञता, यज्ञ-भावना तथा ज्ञान-भक्ति के साथ उसके अंतर्संबंध — का गहन विश्लेषण करता है। साथ ही यह तिलक, विवेकानंद, गांधी, राधाकृष्णन तथा योगानंद जैसे विचारकों की व्याख्याओं के आलोक में कर्मयोग की तुलनात्मक और आधुनिक प्रासंगिकता को भी रेखांकित करता है, और अंत में कॉर्पोरेट प्रबंधन, मनोविज्ञान तथा नैतिक दर्शन में इसके समकालीन अनुप्रयोगों की चर्चा करता है।