महाकवि भास के नाटक: सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य
Keywords:
भास, संस्कृत नाटक, स्वप्नवासवदत्तम्, सामाजिक परिदृश्य, सांस्कृतिक अध्ययन, प्राचीन भारतीय रंगमंचAbstract
संस्कृत नाट्य-परम्परा में महाकवि भास का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। कालिदास से भी प्राचीन माने जाने वाले भास को "नाटककारों का पितामह" कहा जाता है।¹ सन् 1912 में टी. गणपति शास्त्री द्वारा त्रिवेन्द्रम (केरल) से खोजी गई तेरह नाट्य-पाण्डुलिपियों ने भारतीय नाट्य-इतिहास को एक नई दिशा दी।² प्रस्तुत शोध-पत्र भास के नाटकों में चित्रित सामाजिक संरचना, राजनीतिक व्यवस्था, पारिवारिक मूल्य, स्त्री-चेतना, वर्ण-व्यवस्था तथा सांस्कृतिक-धार्मिक जीवन का विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। शोध की पद्धति गुणात्मक एवं विश्लेषणात्मक (Analytical-Qualitative) है, जिसमें मूल संस्कृत नाट्य-ग्रन्थों के श्लोकों, गद्यांशों तथा विद्वानों की समीक्षाओं का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है। निष्कर्षतः यह स्पष्ट होता है कि भास के नाटक मात्र कल्पना-प्रसूत रचनाएँ नहीं, अपितु तत्कालीन आर्यावर्त की सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक चेतना के जीवन्त दस्तावेज़ हैं।