भगवद्गीता में कर्मयोग की दार्शनिक मीमांसा

Authors

  • वीना रानी Author

Keywords:

कर्मयोग, निष्काम कर्म, स्वधर्म, गुणत्रय, समत्व, स्थितप्रज्ञ, यज्ञ, भगवद्गीता, अनासक्ति

Abstract

श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय दर्शन का वह अद्वितीय ग्रंथ है जिसमें जीवन के व्यावहारिक और आध्यात्मिक द्वंद्वों का समाधान प्रस्तुत किया गया है। कर्मयोग, गीता के केंद्रीय सिद्धांतों में से एक है, जो कर्म को त्यागने के बजाय फलासक्ति के त्याग पर बल देता है। यह विस्तारित अध्ययन गीता में वर्णित कर्मयोग की दार्शनिक संरचना — निष्काम कर्म, स्वधर्म, गुणत्रय-विवेचन, समत्व-बुद्धि, स्थितप्रज्ञता, यज्ञ-भावना तथा ज्ञान-भक्ति के साथ उसके अंतर्संबंध — का गहन विश्लेषण करता है। साथ ही यह तिलक, विवेकानंद, गांधी, राधाकृष्णन तथा योगानंद जैसे विचारकों की व्याख्याओं के आलोक में कर्मयोग की तुलनात्मक और आधुनिक प्रासंगिकता को भी रेखांकित करता है, और अंत में कॉर्पोरेट प्रबंधन, मनोविज्ञान तथा नैतिक दर्शन में इसके समकालीन अनुप्रयोगों की चर्चा करता है।

 

Author Biography

  • वीना रानी

    सहायक प्राध्यापिका, संस्कृत विभाग, राजकीय महाविद्यालय, हिसार, हरियाणा

     

     

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Published

2024-06-22

How to Cite

भगवद्गीता में कर्मयोग की दार्शनिक मीमांसा. (2024). थाती शोध पत्रिका, 1(3), 32-42. https://thati.net/index.php/thati/article/view/13

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