वेदान्त दर्शन में ब्रह्म और माया का स्वरूप
Keywords:
वेदान्त, ब्रह्म, माया, अद्वैत, शंकराचार्य, अविद्या, सत्-चित्-आनन्द, अध्यास, विवर्तवाद, मोक्षAbstract
भारतीय दर्शन-परंपरा में वेदान्त दर्शन का स्थान सर्वोच्च माना जाता है, क्योंकि यह उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र तथा भगवद्गीता—इस प्रस्थानत्रयी—पर आधारित एक सुव्यवस्थित तात्त्विक चिंतन-पद्धति है। वेदान्त दर्शन के केंद्र में दो मूलभूत अवधारणाएँ स्थित हैं—ब्रह्म तथा माया। ब्रह्म को सत्-चित्-आनन्द-स्वरूप, निर्गुण, निराकार तथा सर्वव्यापी परम तत्त्व के रूप में स्वीकार किया गया है, जबकि माया उस अनिर्वचनीय शक्ति का नाम है, जो ब्रह्म के एकत्व को नाना रूपों में प्रतीत कराती है और जगत् की सृष्टि, स्थिति तथा प्रलय का कारण बनती है। यह शोध-पत्र आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त, रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैत वेदान्त तथा मध्वाचार्य के द्वैत वेदान्त—इन तीन प्रमुख वेदान्त-सम्प्रदायों में ब्रह्म तथा माया की अवधारणाओं का तुलनात्मक तथा विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र, भगवद्गीता तथा शंकराचार्य के भाष्यों के मूल संस्कृत उद्धरणों के आधार पर यह अध्ययन दर्शाता है कि माया न तो पूर्णतः सत् है और न ही पूर्णतः असत्, अपितु वह अनिर्वचनीय (सदसद्विलक्षण) है, जो ब्रह्म के आश्रय में रहकर जीव को अज्ञानवश जगत् में बाँधे रखती है। यह पत्र यह भी प्रतिपादित करता है कि माया का यथार्थ ज्ञान ही मोक्ष का द्वार है, और वेदान्त का समस्त प्रयोजन जीव को अपने ब्रह्मस्वरूप का साक्षात्कार कराना है। अंततः यह अध्ययन ब्रह्म-माया विमर्श की आधुनिक वैज्ञानिक तथा मनोवैज्ञानिक चिंतन में प्रासंगिकता को भी रेखांकित करता है।