सांख्य दर्शन में प्रकृति और पुरुष की अवधारणा: एक विश्लेषणात्मक साहित्यिक अध्ययन
Keywords:
सांख्य दर्शन, प्रकृति, पुरुष, त्रिगुण, सत्कार्यवाद, कैवल्य, द्वैतवाद, सांख्यकारिकाAbstract
भारतीय दर्शन की षड्दर्शन परम्परा में सांख्य दर्शन को सबसे प्राचीन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला दर्शन माना जाता है। महर्षि कपिल द्वारा प्रवर्तित यह दर्शन द्वैतवादी सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें सृष्टि के मूल में दो स्वतंत्र, अनादि और अनुत्पन्न तत्त्वों—प्रकृति और पुरुष—की स्थापना की गई है। प्रस्तुत शोधपत्र में सांख्य दर्शन के मूल ग्रंथ ईश्वरकृष्ण-कृत "सांख्यकारिका" तथा अन्य सहायक ग्रंथों के आधार पर प्रकृति और पुरुष की अवधारणा का विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इसमें प्रकृति के त्रिगुणात्मक स्वरूप, पुरुष की चेतन-साक्षी स्थिति, दोनों के संयोग से सृष्टि-प्रक्रिया के विकास-क्रम, तथा वेदांत, योग, न्याय-वैशेषिक एवं पाश्चात्य द्वैतवाद (देकार्त) के साथ तुलनात्मक विश्लेषण को सम्मिलित किया गया है। साथ ही विभिन्न विद्वानों के मतों की समीक्षा करते हुए यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि सांख्य का यह द्वैतवाद केवल आध्यात्मिक कल्पना नहीं, अपितु एक सुव्यवस्थित तर्कसंगत ज्ञानमीमांसा है जो आज भी मनोविज्ञान, पर्यावरण-चिंतन तथा चेतना-अध्ययन (Consciousness Studies) के क्षेत्र में प्रासंगिक है।