शोध में नैतिकता: आवश्यकता, महत्व एवं नैतिक मापदण्ड

Authors

  • Parhlad Singh Ahluwalia Author

Keywords:

शोध-नैतिकता, शोध-सत्यनिष्ठा, सूचित सहमति, साहित्यिक चोरी, संदिग्ध शोध-व्यवहार, पंच-स मॉडल

Abstract

शोध का मूल प्रयोजन सत्य की खोज और समाज के हित में ज्ञान का सृजन है। यह प्रयोजन तभी सिद्ध होता है जब शोध-प्रक्रिया ईमानदारी, पारदर्शिता, सहभागियों के सम्मान और सामाजिक उत्तरदायित्व पर टिकी हो। प्रस्तुत अध्ययन विश्लेषणात्मक साहित्यिक शोध-पद्धति से शोध-नैतिकता की आवश्यकता, महत्व और नैतिक मापदण्डों का परीक्षण करता है। इसमें 1947 से 2022 के बीच प्रकाशित 68 स्रोतों का विषयवस्तु-आधारित विश्लेषण किया गया है। इन स्रोतों में पुस्तकें, अंतर्राष्ट्रीय संहिताएँ, राष्ट्रीय दिशानिर्देश और सहकर्मी-समीक्षित शोध-पत्र शामिल हैं। अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष चार हैं। पहला, नैतिक मानकों का विकास ऐतिहासिक त्रासदियों की प्रतिक्रिया में हुआ है, और भारतीय चिंतन-परम्परा में इसके बीज पहले से मौजूद हैं। दूसरा, सर्वेक्षण-आधारित साक्ष्य बताते हैं कि गढ़ंत और मिथ्याकरण अपेक्षाकृत कम हैं, पर संदिग्ध शोध-व्यवहार (Questionable Research Practices) बहुत व्यापक हैं। तीसरा, अधिकांश नैतिक चूकें सुनियोजित धोखाधड़ी से नहीं, बल्कि प्रकाशन-दबाव, अपर्याप्त प्रशिक्षण और संस्थागत कमज़ोरियों से जन्म लेती हैं। चौथा, नियामक कठोरता और शोधकर्ता के आत्म-अनुशासन के बीच संतुलन अनिवार्य है। अध्ययन के अंत में लेखक ने "पंच-स मॉडल" (सत्य, सम्मति, सुरक्षा, सुशासन, समाज-हित) प्रस्तावित किया है, जो हिन्दी-भाषी शोध-जगत के लिए सरल और व्यावहारिक नैतिक-ढाँचा प्रस्तुत करता है।

 

Author Biography

  • Parhlad Singh Ahluwalia

    सम्पादक, शोधबोधालय, हिसार, हरियाणा

     

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Published

2024-03-25

How to Cite

शोध में नैतिकता: आवश्यकता, महत्व एवं नैतिक मापदण्ड. (2024). थाती शोध पत्रिका, 1(2), 1-23. https://thati.net/index.php/thati/article/view/8

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